AMAN AJ

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आई नोट , भाग 22

    अध्याय-4

    इण्टरनल हैप्पीनेस
    भाग-1
    ★★★
    
    आशीष उठा और उठते ही उसने टाइम देखा। घड़ी में 8:00 बज रहे थे। उसने एक लम्बी गहरी सांँस ली और बाथरूम में चला गया। उसने नहाने में तकरीबन 10 मिनट का समय लिया। वह नहाने के बाद बाहर आया और बेडरूम के दूसरी ओर बड़ी दीवार की तरफ चला गया।
    
    दीवार के अन्दर उसके कपड़ों की अलमारी बनी हुई थी। उसने अलमारी खोली तो एक के बाद एक नए नए कोट पेन्ट के जोड़े दिखाई दिए। उसने उनमें से एक को सेलेक्ट किया और पहनने लगा‌।
    
    कोट पेंट पहनने के बाद उसने उसी अलमारी में एक छोटे से दराज को खोलो। वहांँ काफी सारी महंगी महंगी टाईस थी। उसने उसमें से एक टाई निकाली और पहनने लगा। 
    
    टाई पहनने के बाद उसने दराज के पास बने दूसरे दराज को खोला। वो दराज कई सारी घड़ियों से भरा हुआ था। उसने उसमें से अपने लिए एक घड़ी को पसन्द किया। घड़ी पहनने के बाद वह नीचे की तरफ आया। नीचे जहांँ उसका सोफा रखा था, उसके ठीक सामने एक बड़ी सी अलमारी में उसके ढ़ेर सारे चमचमाते हुए जूते पड़े थे। 
    
    उसने वहांँ से एक जूतों का जोड़ा लिया और फिर उन्हें पहनने लगा। पूरी तरह से तैयार हो जाने के बाद वह अपने गेस्ट हा‌उस के बाहर की तरफ चल पड़ा।
    
    एक बिजनेसमैन की तरह तेज चाल चलते हुए,अपनी शर्ट के बाजू वाले बटन बन्द करते हुए, वह काफी स्टाइलिश लग रहा था। उसने उसी स्टाईल में अपने मन में कहा “स्वागत है आपका एक बार फिर से”
    
    बाहर ही ड्राइवर उसकी कार लेकर खड़ा था। उसके काले रंग की लग्जरी कार। आशीष को आता देख ड्राइवर तुरन्त बाहर निकला और पीछे का दरवाजा खोल दिया। आशीष ने अन्दर बैठते हुए ड्राइवर को अपने घर की तरफ जाने के लिए कहा।
    
    जल्द ही आशीष की लग्जरी कार सड़क पर दौड़ रही थी। आशीष ने अपनी टाई सही की और बाहर की तरफ देखते हुए कहा “अब मैं खुद में कुछ बदलाव करूँगा। बाहरी दुनिया में तो नहीं मगर अंदरूनी दुनिया में।” वह पसरता हुआ पीछे की तरफ हो गया “मैं सोचने का काम कम करूंँगा क्योंकि कहीं ना कहीं इंसान की सोच ही है जो उसे पागलपन की ओर ले कर जाती हैं। फिर महान इन्सान भी कहते हैं, सोचने की बजाय सीधे काम करो, क्यों सोच सोच कर अपना टाइम खराब करना और दूसरों का भी।”
    
    उसने अपनी आंँखें बंद की और शान्ति से खुद को सुकून देते हुए कुछ देर के लिए आराम करने लगा।
    
    तकरीबन आधे घण्टे के बाद उसकी लग्जरी कार एक महल जैसे दिखने वाले घर के सामने आकर खड़ी हो गई। उसके महल जैसा दिखने वाला घर हल्के सुनहरे रंग और सफेद रंग दोनों के मिश्रण से सजा हुआ था। घर के बाहर आलीशान पार्क के अन्दर घुमावदार सड़क थी जहांँ कार घूमते हुए ठीक घर के सामने आकर खड़ी हो जाती थी। ढ़ेर सारे नौकर घर के आस-पास काम करते हुए दिखाई दे रहे थे।
    
    कार के रुकते ही आशीष ने अपनी आंँखें खोली और दरवाजा खोलते हुए बाहर आ गया। बाहर आने के बाद वह घर के मुख्य दरवाजे की तरफ चल पड़ा। दरवाजे की तरफ जाते वक्त पीछे से दौड़ता हुआ तकरीबन 40 साल का कोई आदमी आया और गुड मॉर्निंग सर बोलते हुए घर के मुख्य दरवाजे को खोल दिया।
    
    उसके गुड मॉर्निंग बोलते ही आशीष ने उससे कहा “गुड मॉर्निंग देवराज जी, कैसे हैं आप? बड़े दिनों बाद दिखाई दिए?”
    
    देवराज ने सलीके से कोट पेंट पहन रखा था, हालांँकि उसका कोट पेंट महंँगा नहीं दिखाई दे रहा था, मगर वह उसे घर के मैनेजर जरूर दिखा रहा था। चेहरे पर दाढ़ी नहीं थी मगर मोटी मूछें जरूर थी। आंँखें लाल थी जिससे यह पता लग रहा था कि वह नाईट ड्यूटी पर भी काफी जागता रहता है। 
    
    देवराज ने आशीष की बात सुनी तो मुस्कुराते हुए कहा “सर दिखाई तो आप दिए है, मैं तो पिछले 4 महीनों से यहीं रह रहा हूंँ, बस आप ही है जो अपने गेस्ट हाउस और ऑफिस की जिन्दगी से कभी बाहर ही नहीं आते।”
    
    “काम, बाबू मोशाय काम।” आशीष घर के अन्दर बने कार्पेट पर चल रहा था। “काम के लिए इन्सान को पता नहीं क्या-क्या छोड़ना पड़ता है, मैंने तो फिर भी अपने घर से दूरी बनाई है। वह भी हफ्ते में एक आधी बार तो आ ही जाता हूंँ, बस इसी बार नहीं आया।”
    
    “हांँ वह भी है सर।” देवराज ने कहा “अच्छा आपकी जानकारी के लिए बता दूंँ, आज बड़े मालिक ने आपके लिए कुछ खास सोच रखा है।”
    
    देवराज ने यह कहा तो आशीष उसकी तरफ मुस्कुराते हुए देखने लगा “और वह खास क्या है?”
    
    “वह तो अब कुछ देर में आपको पता लग ही जाएगा।” देवराज ने भी हल्की सी मुस्कान देकर अपना रास्ता बदल दिया। वो किचन की तरफ चला गया था ताकि वहांँ से खाने पीने की व्यवस्था को सम्भाला जा सके।
    
    वहीं आशीष एक नजर देवराज को जाते हुए देखता रहा, इसके बाद उसने सामने की तरफ देखा। वही उसे उसकी बड़ी बहन दिखाई दी जो सीढ़ियों से नीचे उतरते हुए आ रही थी। 
    
    उसकी बड़ी बहन तकरीबन 28 साल की लग रही थी। दिखने में सुन्दर और अट्रैक्टिव थीं। गोरे रंग की और लम्बे बालों वाली आशीष की बहन ने काले रंग का कट वाला गाउन पहन रखा था। कट वाले गाऊन की वजह से कभी-कभी चलते वक्त उसकी एक साइड की टाँग गाऊन से बाहर निकलती हुई दिखाई दे जाती थी।
    
    जैसे ही आशीष ने अपनी बड़ी बहन को देखा उसने अपने दोनों हाथ फैलाए और कहा “ओह,सोम्या, तुम्हें कई दिनों बाद देख कर खुशी हुई।”
    
    सोम्या ने मुंँह को अजीब सा किया और कहा “रहने दो भाई, आपको और खुशी ,वो भी मुझे देख कर, आपका बस चले तो आप जहर देकर मुझे मार दो।” सोम्या पास आई और आशीष के गले लगी‌।
    
    गले लगते हुए आशीष ने उससे कहा “तुम फिकर मत करो, मैं तुम्हें इतनी सस्ती मौत नहीं दूंँगा।” उसके कहने का अंन्दाज ऐसा था कि यह भी नहीं लग रहा था वह मजाक में कह रहा है या फिर सीरियस होकर।
    
    सोम्या पीछे की तरफ हुई और कहा “अच्छा हुआ भाई आप आ गए, आज आपके लिए काफी बड़ा सरप्राइज है, पापा ने कुछ स्पेशल सोचा है आपके लिए”
    
    “स्पेशल मगर क्या!!” पहले देवराज से और अब अपनी बहन से, दोनों से ही इस तरह की बात सुनकर उसके दिमाग में घण्टियांँ बजने लगी थी।
    
    सोम्या ने हंँसमुख चेहरा बनाया और कहा “यह तो अब आपको कुछ ही देर में पता चल ही जाएगा।”
    
    तभी सीढ़ियों से आशीष के मम्मी पापा उतरते हुए दिखे।‌ उसकी मांँ ने महंँगी ग्रोसरी वाली साड़ी पहन रखी थी। चेहरे पर हल्का मेकअप था और माथे पर मोटी बिन्दी। वहीं उसके पापा ने महंँगे काले रंग का कोट पेंट पहन रखा था। मांँ का हाथ पिता की बाजू में था। दोनों ही एक साथ नीचे उतरकर आ रहे थे।
    
    जैसे ही वो लोग नीचे उतर कर आ गए आशीष आगे बढ़ा और दोनों के पैर छुए। जैसे ही वह पैर छुकर ऊपर की तरफ हुआ उसके पिता ने उसके कन्धे थपथपाऐ और कहा “आज आखिरकार मेरे बेटे को अपने डेड की याद आ ही गई।” कहते कहते उन्होंने आशीष को गले लगा लिया।
    
    आशीष भी गले लगते हुए बोला “आपको तो मैं भुल भी कैसे सकता हूंँ..।” तभी अचानक उसके दिमाग बजा जिसने आसपास की सब चीजों को उसके लिए ना सुनने लायक बना दिया। वह अपने दिमाग में कुछ सोचना ही वाला था कि तभी उसने अपनी आंँखें झपकाई और खुद को सोचने से रोका। खुद को सोचने से रोकते ही उसने कहा “आपकी वजह से ही तो मैं ऐसा बना हूंँ।” वह मुस्कुराया और एक मुस्कान देकर कहा “एक सफल बिजनेसमैन.... जिसे आप का बिजनेस बुलंदियों पर लेकर जाना है।”
    
    आशीष के पिता ने आशीष के गाल थपथपाए “हांँ मैं जानता हूंँ, तुम्हारा टैलेंट सच में हमारे बिजनेस को बहुत ऊपर लेकर जाने वाला है, तुम सबसे अलग जो सोचते हो।” उन्होंने आशीष की मांँ की तरफ देखा “क्यों मैंने सही कहा ना?”
    
    आशीष की मांँ ने मुस्कुराहट दिखाई और आशीष को गले लगा लिया “हांँ बिल्कुल।” गले लगाते हुए वह बोली “हमारा बेटा हमारा काफी नाम रोशन करेगा।”
    
    आशीष के पिता की उम्र तकरीबन 50 के आसपास थी। चेहरे की दाढ़ी वैसे तो काली थी मगर काफी जगहों से सफेद पड़ चुकी थी। सर के बाल भी उड़ने लगे थे। चेहरे पर अलग सी मुस्कान और अन्दाज रहता था। जो गौर से देखने पर तो खतरनाक लगता था मगर वैसे देखने पर उन्हें एक शातिर बिजनेसमैन की तरह दिखाता था। आशीष की मांँ की उम्र 48 साल के आसपास लग रही थी। उसके बाल ज्यादा बड़े नहीं थे, एक साइड के बाल बस कानों तक आते थे। उनके चेहरे से भी किसी तरह की शातिर औरत होने की झलक दिखती थी।
    
    मेल मिलाप के बाद दोनों ने हीं आशीष के कन्धे पर हाथ रखा और डाइनिंग टेबल की तरफ चल पड़े। वहांँ एक के बाद एक चारों डाइनिंग टेबल पर बैठ गए। आशीष के पिता बड़ी कुर्सी पर बैठे थे। उनके ठीक सामने आशीष बैठा था। एक ओर सोम्या थी और एक ओर आशीष की मांँ। खाने-पीने का सारा सामान देवराज ने पहले से ही डाइनिंग टेबल पर सजा दिया था।
    
    आशीष के पिता ने एक चम्मच उठाया और उसे अपने हाथ में पकड़ते हुए सभी को सम्बोधित करते हुए कहा “इससे पहले कि तुम लोग खाना शुरू करो, मैं तुम लोगों को एक खुशखबरी देना चाहूंँगा।” उन्होंने आशीष पर खास ध्यान केंद्रित किया “ऐसी खुशखबरी जो आशीष की जिन्दगी को बदल देगी।” फिर वह बाकी सभी लोगों को देखने लगे “इससे हमारे परिवार को शहर में भी वो पहचान मिलेंगी जो अभी तक किसी को नहीं मिली। हमारे बिज़नेस का क्षेत्र बढ़ेगा। हम सिर्फ इस शहर में नहीं, बल्कि आसपास के शहर में भी नाम कमाएंँगे।”
    
    सौम्या और आशीष की मांँ के रिएक्शन तो नॉर्मल थे, मगर आशीष खुद को हेजिटेशन में महसूस कर रहा था। उसनेे इसी हैजिटेशन में आधी हंँसी के साथ कहा “और वह खुशखबरी क्या है... क्या हम किसी नई कम्पनी को खरीदने जा रहे हैं!”
    
    “नहीं।” आशीष के पिता बोले “हमने तुम्हारी शादी हर्षवर्धन की बड़ी बेटी स्नेहा से करने का फैसला कर लिया है।”
    
    आशीष के पिता ने इतना कहा और आशीष के दोनों हाथों की उंँगलियांँ सिमटकर मुट्ठी में बदल गई।
    
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